Thursday, March 24, 2016

उपकरण न मैदान कैसे हो खेल


Thu, 24 Mar 2016 11:35 PM (IST)
फैजाबाद : खेलों के विकास में विद्यालयों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही वजह है कि स्कूली खेल से परे खेल संघों की या विभागीय प्रतियोगिताएं हों, सभी में विद्यालयों की ही प्रतिभागिता होती है। लेकिन इस जिले में इस महत्वपूर्ण कड़ी को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है वरिष्ठों की मानें तो इसका कारण विद्यालयों में सुविधाओं का अभाव है। बात चाहे खेल उपकरणों की हो या फिर अभ्यास व प्रतियोगिताओं के आयोजन के लिए खेल मैदानों की, सुविधाओं के अभाव का खामियाजा खिलाड़ियों को ही भुगतना पड़ रहा है। खेलों के प्रति विद्यालयों की रुचि और प्रतिभाओं को तराशने के प्रति संजीदगी का अहसास इसी से किया जा सकता है कि शायद ही कोई विद्यालय होगा जो अपने यहां अवकाश के दिनों में समर कैंप का आयोजन करता हो। लोगों का मानना है कि विद्यालयों के पास मैदान का न होना खिलाड़ियों की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। शहरी विद्यालयों में यह एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान होना शायद ही संभव हो। फिलवक्त वे अपने खास आयोजन राज्य विद्यालयीय क्रीड़ा संस्थान के मैदान पर करा कर इतिश्री तो कर लेते हैं पर विद्यालयीय खिलाड़ियों को सत्र का स्थायित्व नहीं दे पा रहे हैं। इसे प्रतिभाओं का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिनके पास खेल मैदान हैं वे खेलों से दूरी बनाए हुए हैं। शहर में राजकीय इंटर कालेज को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई विद्यालय ऐसा होगा जिसके पास पर्याप्त खेल मैदान है, जिस पर हॉकी, फुटबॉल व क्रिकेट जैसे खेलों का आयोजन कराया जा सके। खिलाड़ी ही कहते हैं कि ग्रामीण अंचल के विद्यालयों के पास मैदानों की कमी नहीं है पर न जाने क्यों वे आयोजन से कन्नी काटे रहते हैं। विभागीय प्रतियोगिताएं आवंटित भी हुईं तो वे उसे करवा पाने में असमर्थता जता कर दूरी बना लेते हैं। शायद यही वजह है कि लगभग 450 माध्यमिक विद्यालयों वाले जिले की प्रतियोगिताओं में प्रतिभागिता चंद विद्यालयों तक सिमट कर रह जा रही है। ग्रामीण अंचल के विद्यालय खेल की औपचारिकता ही निभा रहे हैं। खिलाड़ियों की मानें तो प्रतियोगिताओं में प्रतिभागिता तो दूर की बात रही, स्कूलों में खेल की औपचारिकता भी नहीं निभाई जाती है। न तो खेलने के लिए उपकरण दिया जा रहा है और न ही अभ्यास के लिए समय ही निर्धारित किया जा रहा है। ग्रामीण अंचल के विद्यालयों में खेल मैदान होने के बाद भी खेलों के प्रति नकारात्मक ²ष्टि प्रतिभाओं का हनन कर रही है। सुविधा होने के बाद भी ऐसा न करना खिलाड़ियों की प्रतिभा के साथ खिलवाड़ करना है।

अयोध्या शोध संस्थान में चित्रकला शिविर का उद्घाटन आज


अयोध्या शोध संस्थान में चित्रकला शिविर का उद्घाटन आज

Thu, 24 Mar 2016 11:34 PM (IST)
फैजाबाद: अयोध्या शोध संस्थान में पांच दिवसीय राष्ट्रीय चित्रकला शिविर का आयोजन 25 मार्च से होगा। संस्थान के निदेशक डॉ. योगेंद्र प्रताप ¨सह ने बताया कि 25 मार्च को अपराह्न 12 बजे भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के अपर सचिव दुर्गाशंकर मिश्र कला शिविर का उद्घाटन करेंगे। इस राष्ट्रीय चित्रकला शिविर में एमके पुरी (दिल्ली), विनय शर्मा (जयपुर), डगलस जॉन (मुम्बई), राजेंद्र प्रसाद (लखनऊ), शिवा बालन (चेन्नई), राकेश कुमार मल्होत्रा (श्रीनगर), दिप्तिश घोष दस्तीदार (कोलकाता), अपर्णा अनिल (भोपाल), मिलन दास (पटना) हिस्सा लेंगे। इनके अलावा शार्दूल कदम (मुम्बई), हेलेन बाला ब्रह्मा (भुवनेश्वर), दिलीप तामुली (गुवाहाटी), राहुल मुखर्जी (बड़ौदा), उमेन्द्र ¨सह (कानपुर), अवधेश मिश्र (लखनऊ), डॉ. राजेश कुमार व्यास (कला समीक्षक-जयपुर) भी कला शिविर में प्रतिभाग करेंगे। शिविर के समन्वयक डॉ. अवधेश मिश्र ने बताया कि कला शिविर का विषय 'अयोध्या के राजा'' और ''अयोध्या का स्थापत्य'' होगा।

रंगोत्सव की धुन पर जम कर थिरकी रामनगरी

रंगोत्सव की धुन पर जम कर थिरकी रामनगरी

Thu, 24 Mar 2016 11:27 PM (IST)
अयोध्या: रामनगरी होली के रंग में डूबी नजर आई। बच्चों और युवाओं से लेकर बड़े-बूढ़े तक रंगों के आदान-प्रदान में मगन रहे। पौ फटते ही होली का हुलास बिखरा। नित्य क्रिया के बाद ही लोग सड़क पर आ गए। बच्चे पिचकारी और गुब्बारे से सामने वाले को लाल कर रहे थे, तो किशोर और युवा पूरे अधिकार से होली की साध पूरी कर रहे थे। देखते-देखते विभिन्न मार्ग होलिकारों से पट गए। यह सिलसिला अपराह्न तक चला। विभिन्न मंदिर भी होली से गुलजार रहे। यूं तो प्राय: सभी मंदिरों में प्रात: पूजन-अर्चन के उपरांत आराध्य के विग्रह को रंग-गुलाल अर्पित किया गया पर कुछ मंदिरों में होली की भरी-पूरी महफिल सजी। मंदिरों के प्रांगण रंग-गुलाल से सराबोर हुए, आराध्य के दरबार में राग-रंग से ओत-प्रोत होली गीत अर्पित हुए। होली के प्रवाह में होलिकारों के जुलूस ने भी समां बांधा। बजरंगबली की प्रधानतम पीठ हनुमानगढ़ी से भी ढोल-नगाड़ा के साथ सैकड़ों नागा साधु निकले। पुजारी रमेशदास, राजूदास, राजेश पहलवान, मनीरामदास, विवेकदास, रामसुंदरदास, नवीनदास आदि के संयोजन में निकले जुलूस में सौ के करीब नागा साधु शामिल रहे। उहोंने रंगमहल, जगन्नाथ मंदिर, लवकुश मंदिर, जानकीघाट बड़ास्थान, रामवल्लभाकुंज, खाकचौक आदि मंदिरों तक पहुंच होली की रौनक बुलंद की। रामकोट स्थित प्रमुख पीठ दशरथगद्दी में महंत बृजमोहनदास के संयोजन में फूलों की होली खेली गई। उन्होंने कहा कि होली मेल-मिलाप का पर्व है और यह निकटता फूलों की तरह नरमी, ताजगी और सुगंध की बनुयिाद पर होनी चाहिए। ऐसे में फूलों से बेहतर होली का कोई और माध्यम नहीं है। रसिकों की प्रधान पीठ लक्ष्मणकिला में रंगों के साथ आचार्य प्रणीत रंग भरे पदों से होली मनाई गई। रामभक्तों की प्रधान पीठ कनकभवन प्रात:काल से ही गुलजार रही पर सांझ ढलते ही कनकबिहारी के दरबार की रौनक शिखर पर पहुंची। पुष्पों और इत्र की भीनी सुगंध एवं अबीर-गुलाल की धुंध के बीच भक्तों का रेला पूरी चहक के साथ कनकबिहारी के दरबार में उपस्थित था, तो मंजे गायकों का समूह अध्यात्म में लिपटे फाग प्रस्तुत कर इस अवसर को यादगार बना रहा था। कनकबिहारी के विशेष अनुरागी मधुकरी संत मिथिलाबिहारीदास के अनुसार यहां भगवान के सम्मुख गायकी का अलग आनंद है और होली का मौका हो, तो कहना ही क्या।
फूलों और गुलाल से आच्छादित रहा श्याम दरबार : पौराणिक महत्व की पीठ नाका हनुमानगढ़ी स्थित श्याम दरबार में होलिकोत्सव का शुभारंभ एडीएम सिटी रामनिवास शर्मा, एसपी सिटी संकल्प शर्मा एवं सिटी मजिस्ट्रेट वीके पांडेय ने किया। पीठ के प्रशासक पुजारी रामदास ने उत्सव संयोजित करने के साथ मेहमानों का स्वागत किया। तदुपरांत फूलों और गुलाल की छटा बिखरी। प्रात: से मध्याह्न तक श्याम दरबार फूलों और गुलाल की रौनक से आच्छादित रहा। गीतों के माध्यम से राधा-कृष्ण की होली पूरी रमणीयता से अभिव्यक्त हुई। कलाकारों ने घंटों समां बांधे रखा, लोग झूमते-थिरकते रहे। इस मौके पर सुरेंद्र अग्रवाल बसु, पुजारी रामनेवाजदास, अजय तिवारी, रामप्रताप ¨सह आदि सहित सैकड़ों भक्त होली की मस्ती में डूबे।
फैजाबाद में भी सिर चढ़कर बोला होली का जादू : नवाबों की पुरानी राजधानी पर भी होली का जादू सिर चढ़कर बोला। लोग सुबह से ही होली खेलने वाले संगी-साथी की तलाश में उमड़े। जल्दी ही सभी नाका-नुक्कड़ होलिकारों के कब्जे में हो गये, जो भी गुजरा उसे रंगों से सराबोर किया गया। किसी के मुंह में गाढ़ा हरा रंग तो किसी को बार्निश से पेंट किया गया, जो बचकर निकला उसके ऊपर पिचकारी की तेज धार अथवा रंग भरे गुब्बारे से प्रहार किया गया। ..तो कई हंसी-खुशी गले मिलकर होली के हुलास का आदान-प्रदान करते रहे। चौक घंटाघर, रिकाबगंज चौराहा, रिकाबगंज हनुमानगढ़ी, नियावां, फतेहगंज, मोदहा, देवकाली चौराहा, नाका, जनौरा आदि में होली खेलने वालों का मोर्चा पूरी मुश्तैदी से सजा रहा। ..तो घरों में भी होली का रंग घुलता रहा। महिलाओं से लेकर बच्चों तक ने होली की धड़कन बढ़ाए रखी। जगह-जगह से होली खेलने वालों की टोलियां थीं। वे गीत-संगीत के साथ होली की अलख जगाते आगे बढ़ रहे थे।